अभियान के क्रम में मुझे कैमूर - सोनभद्र सीमा क्षेत्र के पहाड़ी इलाकों में रहने का मौका मिला | यह क्षेत्र हर तरफ से पहाड़ों से घिड़ा है एवं विकासशील बिहार तथा विकसित भारत से सैकड़ों वर्ष पीछे है | यहाँ ना टीवी है ना मोबाइल tower | आवगमन हेतु करीब 40 किलोमीटर पैदल चलना | सड़कें नहीं हैं क्यूंकि माओवादियों द्वारा सड़क निर्माता कम्पनी से लेवी के रूप में मोटी रकम मांगी जाती है | इस डर से कोई काम नहीं करना चाहता |
ऊपर की तस्वीर एक स्कूल की है | कोई डेढ़ सौ जनजाति बच्चे इस स्कूल में पढ़ते हैं | स्कूल खुली आसमान में एक बरगद के पेड़ के नीचे चलता है | मास्टर साहेब पास के ही एक पहाड़ी गाँव के हैं जिनकी पढाई का निरिक्षण करने वाला कोई नहीं है|छोटे जनजाति बच्चों में पढ़ने की ललक एवं मास्टर साहेब में बच्चों के भविष्य सवांरने का जूनून देख कर जब बच्चों से मैंने पूछा की भारत का प्रधानमंत्री कौन है तो कुछ बच्चों ने कहा "मनमोहन सिंह" | STF के एक जवान ने पूछा की बिहार की राजधानी कहाँ है तो जवाब मिला "पटना" | हम सभी ने मास्टर साहब की तारीफ़ की एवं देश के भविष्य सवांरने के इस प्रयास के लिए हम सभी ने धन्यवाद दिया|
चूँकि हमें उन इलाकों में अभियान हेतु कुछ दिनों तक रहना था, हमें इच्छा हुई की हम अपने श्रमदान से वहां स्कूल भवन बनायें ताकि बच्चे बारिश के दिनों में भी निर्बाध्य रूप से पढाई कर सकें | इस कार्य को करने के लिए पहाड़ पर पत्थर एवं लकड़ी की कोई कमी नहीं थी | STF के जवानों की इस प्रस्ताव से जब मैंने बच्चों को अवगत कराया तो एक छात्र जो बाकियों से उम्र में कुछ बड़ा एवं समझदार दिख रहा था , ने कहा की हम ऐसे ही भले हैं, अगर स्कूल बनाया तो माओवादी आकर बम लगा कर उड़ा देंगे और फिर मास्टर साहेब भी कही चले जायेंगे | मास्टर साहेब ने कहा की पूर्व में एक सरकारी स्कूल था जिसे आम चुनाव के वक्त पार्टी (माओवादी) के लोगों ने उड़ा दिया था|
अभियान की समाप्ति के पश्चात मै पटना लौट आया| चूँकि बहुत दिनों से टीवी के दर्शन नहीं हुवे थे सो बैठ गया अपने प्रिय न्यूज़ चैनल NDTV 24x7 व TIMES NOW देखने| अर्नब गोस्वामी एक गरमा गरम बहस का सँचालन कर रहे थे | विषय था माओवादियों की विरुद्ध "ऑपरेशन ग्रीन हंट" का| कुछ बुद्धिजीवी जो संभवतः दिल्ली विश्व विद्यालय एवं जे एन यु के प्रोफेसर साहब थे, इस अभियान का पुरजोर विरोध कर रहे थे एवं इसे "WAR AGAINST TRIBALS" बता रहे थे | अपनी तर्क से अच्छे अच्छों को चुप कर दे रहे थे | सभी को चुप देख वे मुस्कुराते भी थे | जब उनसे नक्सली हिंसा की बात की जाती तो वे कहते की गरीबों का विद्रोह है एवं समाधान बातचीत करने में ही है | जब इन्हें याद दिलाया गया की माओवादी तो "POWER FLOWS FROM THE BARREL OF GUN" के सिद्धांत पे चलते हैं तो क्या वे बातचीत करेंगे ? उन्होंने कहा की प्रयास करना चाहिए | एक नक्सली वेबसाइट से ज्ञात हुआ की एक साहब तो RDF में उच्च पद पर आसीन भी हैं | RDF माओवादियों का एक "Front Organisation" यानि की मुखौटा है | इसमें वैसे लोग होते हैं जो स्वयं हिंसा में संलिप्त नहीं होते परन्तु माओ के विचार को जन जन तक पहुंचाते हैं एवं सरकार के विरुद्ध propaganda करते हैं | यानि की "white collar criminal "
दिल्ली और बड़े शहरों में रह कर और अंग्रजी टीवी चैनल / पत्र पत्रिकाओं में भारतीय जनजातियों के बारे में देख / पढ़ कर Tribal Welfare की बात करने वालों को जाकर बिहार के उन इलाकों में जनजातियों की स्तिथि से अवगत होना चाहिए जहाँ माओवादियों के लेवी की लालच में सड़क, स्कूल निर्माण बाधित है| जहाँ के बच्चे आज भी खुली आसमान के नीचे पढ़ने की विवश हैं | पिछले दो वर्षों में माओवादियों ने सिर्फ बिहार राज्य में १०० से अधिक स्कूल भवन और ५० से अधिक मोबाइल टावर को उड़ाया है | ये सभी जनजाति बहुल ईलाकों में थे | गरीब-किसान-मजदूर को अपने सत्ता के जंग का मोहरा बनाने वालों को ये हमेशा याद रखना चाहिए की बिहार के आदिवासी शान्ति प्रिय हैं | Struggle for power में आदिवासियों को हथियार पकडाना पुरे Tribal Culture का विनाश करना है |
आज जरुरत इस बात कि है कि आदिवासी बच्चों को बाल छापामार ना बनाकर एवं हथियार का प्रशिक्षण ना दे कर उनके स्कूल को बनने दें एवं उन्हें पढ़ने का मौका दें ताकि वे भी कल दिल्ली एवं जे एन यु विश्वविद्यालय में पढ़कर अपना भविष्य संवार सकें |
